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Saturday, May 26, 2012

कुछ ख्वाब होते हैं (Kuch Khwab Hote Hain)



कुछ ख्वाब होते हैं (Kuch Khwab Hote Hain)



घरौंदे जैसे बचपन के ख्वाब
एक टूटा तो नया बना लेते हैं 
कुछ, ताज़ा लम्हों की रेत से बना के
वक्त की नदी के किनारे यूँ ही छोड़ आते हैं


कुछ ख्वाब हमारे साथ बड़े होते हैं
कुछ हमारे birthday पे cake की तरह
हर साल कटते जाते हैं
और कुछ cake पे रखी मोमबत्तियों की तरह
हम खुद ही बुझा देते हैं


कुछ ख्वाब हम बनाते हैं
और कुछ ख्वाब हमे बनाते हैं
कुछ जिस्म पे एक निशान बन के रह जाते हैं


पर कुछ ख्वाब बड़े ढीठ होते हैं


ऐसा ही एक ख्वाब है ये
इस ख्वाब की उम्र बड़ी लम्बी है


ये बिन पूछे पनपता है
बाहर आने को मचलता है
शमा की तरह जलता है
पर हकीकत की हवा से डरता है


बाहर आ के बुझ न जाये
जब तक अन्दर है झूठ है पर जिंदा है
बाहर की भगदड़ में किसी सच
से कुचलने की आशंका है


ये ख्वाब मरेगा तो नहीं पर जाने कब निकलेगा


इस ख्वाब की उम्र बड़ी लम्बी है 
ये ख्वाब मेरे कब्र तक जायेगा
और पस-ए-मर्ग शायद, कब्र पे
एक पौधा बन के निकलेगा

Friday, April 27, 2012

क्या 'हम' तालिबान से कम हैं?


क्या 'हम' तालिबान से कम हैं?
 

कल फिर एक औरत को नंगा करके गांव में घुमाया गया। सजा के तौर पर। अपराध? कौन पूछता है! क्या फर्क पड़ता है! इतना कम है क्या कि वह औरत है। उसे नंगा किया जा सकता है। और इसकी सजा तो बड़ी होगी!

वहां भीड़ जमा होगी। किसी ने पूछा होगा, क्या सज़ा दें? कहीं से आवाज आई होगी, इनके कपड़े फाड़ डालो। वाह...सबके मन की बात कह दी। हां...हां फाड़ डालो। एक ढोल भी मंगाओ। नंगी औरतों के पीछे-पीछे अपनी मर्दानगी का ढिंढोरा पीटने के काम आएगा। सज़ा भी दी जाएगी और सबको बता भी दिया जाएगा कि हम कितने बड़े मर्द हैं।

' हम '... वही हैं, जो तालिबान को जी भरकर कोसते हैं। वे लड़कियों के स्कूल जलाते हैं, हम उन्हें नामर्द कहते हैं। वे कोड़े बरसाते हैं, हम उन्हें ज़ालिम कहते हैं। वे टीचर्स को भी पर्दों में रखते हैं, हम उन्हें जंगली कहते हैं। 'हम', जो हमारी संस्कृति और इज़्ज़त की रक्षा के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहते हैं।

'हम'... जो अपनी बेटियों के मुंह से प्यार नाम का शब्द बर्दाश्त नहीं कर सकते। यह सुनते ही उबल उठते हैं कि जाट की लड़की दलित के लड़के के साथ भाग गई। उन्हें ढूंढते हैं, पेड़ों से बांधते हैं और जला डालते हैं... ताकि संस्कृति बची रहे। इस काम में लड़की का परिवार पूरी मदद करता है, क्योंकि उसके लिए इज़्ज़त बेटी से बड़ी नहीं। उसके बाद लड़के के परिवार को गांव से निकाल देते हैं।

'हम'... जो भन्ना उठते हैं, जब लड़कियों को छोटे-छोटे कपड़ों में पब और डिस्को जाते देखते हैं। फौरन एक सेना बनाते हैं... वीरों की सेना। सेना के वीर लड़कियों की जमकर पिटाई करते हैं और उनके कपड़े फाड़ डालते हैं। जिन्हें संस्कृति की परवाह नहीं, उनकी इज़्ज़त को तार-तार किया ही जाना चाहिए। उसके बाद हम ईश्वर की जय बोलकर सबको अपनी वीरता की कहानियां सुनाते हैं।

'हम'... जो इस बात पर कभी हैरान नहीं होते कि आज भी देश में लड़के और लड़कियों के अलग-अलग स्कूल-कॉलेज हैं। जहां लड़के-लड़की साथ पढ़ते हैं, वहां भी दोनों अलग-अलग पंक्तियों में बैठते हैं। क्यों? संस्कृति का सवाल है। दोनों साथ रहेंगे तो जाने क्या कर बैठेंगे।
‘हम'... जो रेप के लिए लड़की को ही कुसूरवार ठहराते हैं क्योंकि उसने तंग और भड़काऊ कपड़े पहने थे।

'हम'... जो अपनी गर्लफ्रेंड्स का mms बनाने और उसे सबको दिखाने में गौरव का अनुभव करते हैं और हर mms का पूरा लुत्फ लेते हैं।

'हम'... यह सब करने के बाद बड़ी शान से टीवी के सामने बैठकर तालिबान की हरकतों को 'घिनौना न्याय' बताकर कोसते हैं और अपनी संस्कृति को दुनिया में सबसे महान मानकर खुश होते हैं।

क्या 'हम' तालिबान से कम हैं?

Friday, November 11, 2011

Toh zinda ho tum...... !!!!

Dilon mein tum apni,
Betaabiyan leke chal rahe ho
Toh zinda ho tum
Nazar mein khwabon ki
Bijliyan leke chal rahe ho
Toh zinda ho tum
Hawa ke jhokon ke jaise
Aazad rehno sikho
Tum ek dariya ke jaise
Lehron mein behna sikho
Har ek lamhe se tum milo
Khole apni bhaayein
Har ek pal ek naya samha
Dekhen yeh nigahaein
Jo apni aankhon mein
Hairaniyan leke chal rahe ho
Toh zinda ho tum
Dilon mein tum apni
Betaabiyan leke chal rahe ho
Toh zinda ho tum